मद्रास
उच्च न्यायालय ने हाल ही में वकील संगठनों द्वारा छोटे-मोटे या तुच्छ कारणों से
बार-बार अदालत का बहिष्कार करने पर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि
इस तरह की कार्रवाइयां न केवल न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करती हैं,
बल्कि जनता के विश्वास को भी ठेस पहुंचाती हैं। आइये इस लेख हम इस
मुद्दे को सरल भाषा में समझते है और बताते है कि क्यों यह एक गंभीर समस्या है।
अदालत
का बहिष्कार क्यों है चिंता का विषय?
वकील
समाज में न्याय के रक्षक होते हैं। वे अदालतों में वादियों की पैरवी करते हैं और
न्याय प्रणाली को सुचारू रूप से चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन जब
वकील छोटे-मोटे कारणों, जैसे व्यक्तिगत शिकायतों या
असहमति के चलते अदालत का बहिष्कार करते हैं, तो इससे कई
समस्याएं पैदा होती हैं:
1. मामलों
की सुनवाई में देरी: बहिष्कार के कारण अदालतों
में सुनवाई रुक जाती है, जिससे पहले से ही लंबित मामलों का
बोझ और बढ़ता है।
2. वादियों
को असुविधा: जिन लोगों के मामले अदालत में हैं,
उन्हें लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है, जिससे
उनकी परेशानी बढ़ती है।
3. न्याय
प्रणाली पर अविश्वास: बार-बार बहिष्कार से जनता
का न्याय प्रणाली में विश्वास कम होता है। लोग सोचने लगते हैं कि अदालतें उनके लिए
समय पर न्याय नहीं दे सकतीं।
4. अदालतों
का कामकाज प्रभावित: वकीलों की अनुपस्थिति से
जजों को भी सुनवाई करने में कठिनाई होती है, क्योंकि वकील
केस की जानकारी और तर्क पेश करते हैं।
मद्रास
उच्च न्यायालय ने कहा कि वकील अदालत के महत्वपूर्ण हिस्सेदार हैं। उनकी जिम्मेदारी
है कि वे न्याय प्रणाली को मजबूत करें, न कि उसे
बाधित करें।
मद्रास उच्च न्यायालय का रुख
न्यायमूर्ति
एस.एम. सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति ए.डी. मारिया क्लेटे की खंडपीठ ने इस मामले में
सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि:
- तुच्छ कारणों से बहिष्कार
अस्वीकार्य: वकीलों को छोटी-मोटी
शिकायतों के लिए अदालत का बहिष्कार करने की बजाय उचित रास्ता अपनाना चाहिए।
- बार काउंसिल से संपर्क करें:
अगर वकीलों को कोई समस्या है, तो उन्हें
बार काउंसिल या अन्य सक्षम अधिकारियों के पास अपनी शिकायत दर्ज करानी चाहिए।
- न्यायिक प्रक्रिया में बाधा न
डालें: बहिष्कार से न केवल अदालत का समय
बर्बाद होता है, बल्कि यह जनहित के खिलाफ भी है।
अदालत
ने यह भी कहा कि वकीलों को संयम और जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। उनकी कार्रवाइयां न
केवल उनके पेशे की गरिमा को प्रभावित करती हैं, बल्कि
समाज के सामने गलत उदाहरण भी पेश करती हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला
मद्रास
उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का जिक्र किया,
जिनमें वकीलों के बहिष्कार को गलत ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने
बार-बार कहा है कि:
- वकीलों को अपनी शिकायतों के लिए
अदालत का बहिष्कार करने की बजाय कानूनी और उचित रास्ते अपनाने चाहिए।
- बार काउंसिल या अन्य सक्षम
संस्थाएं शिकायतों के समाधान के लिए हैं। वकीलों को इनका सहारा लेना चाहिए।
- न्याय प्रणाली में वकील एक
महत्वपूर्ण कड़ी हैं। उनकी गैर-जिम्मेदाराना हरकतें पूरे सिस्टम को नुकसान
पहुंचाती हैं।
तिरुनेलवेली बार एसोसिएशन का मामला
यह
पूरा मामला तिरुनेलवेली बार एसोसिएशन के बार-बार बहिष्कार से शुरू हुआ। आर. जिम
नाम के एक व्यक्ति ने मद्रास उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। उन्होंने मांग
की थी कि तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल को तिरुनेलवेली बार एसोसिएशन के
पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया जाए। याचिकाकर्ता का कहना था
कि:
- बार एसोसिएशन के बहिष्कार से जनता
को परेशानी हो रही है।
- कुछ वकील जो अदालत में उपस्थित
होना चाहते हैं, उन्हें भी काम करने से
रोका जा रहा है।
- यह गतिविधियां अवैध और अनुचित
हैं।
अदालत का जवाब
अदालत
ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ठोस सबूत पेश करने में नाकाम
रहा। उनके पास यह दिखाने के लिए कोई विशिष्ट जानकारी नहीं थी कि कौन से लोग।िल
गलतियों में शामिल थे। अदालत ने कहा कि:
- विशिष्ट शिकायतों की कमी:
बिना ठोस सबूत के बार काउंसिल कोई अनुशासनात्मक कार्रवाइ नहीं
कर सकती।
- याचिकाकर्ता को मौका:
याचिकाकर्ता ने वादा किया कि वह दोषी वकीलों के खिलाफ विशिष्ट
शिकायत दर्ज करेगा।
- बार काउंसिल को निर्देश:
अदालत ने बार काउंसिल को आदेश दिया कि अगर शिकायत मिलती है,
तो अधिवक्ता अधिनियम के तहत उचित कार्रवाइ की जाए।
वकीलों के लिए अदालत की सलाह
मद्रास
उच्च न्यायालय ने वकीलों को साफ शब्दों में समझाया कि:
1. संयम
और जिम्मेदारी: वकीलों को अपनी शिकायतों के
लिए कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए, न कि बहिष्कार जैसे कदम
उठाने चाहिए।
2. बार
काउंसिल का उपयोग: बार काउंसिल वकीलों की
समस्याओं के समाधान के लिए बनाया गया है। इसका सहारा लेना चाहिए।
3. न्याय
प्रणाली की गरिमा: वकील अदालत के अधिकारी हैं।
उनकी हरकतें न्याय प्रणाली की गरिमा को बनाए रखनी चाहिए।
अदालत
ने यह भी कहा कि अगर वकील अपनी शिकायतों का समाधान चाहते हैं,
तो उन्हें ठोस सबूत और उचित प्रक्रिया के साथ आगे आना होगा। बिना
सोचे-समझे बहिष्कार करना कोई समाधान नहीं है।
जनता पर इसका प्रभाव
वकीलों
के बहिष्कार का सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को होता है। भारत में पहले ही अदालतों
में लाखों मामले लंबित हैं। ऐसे में बहिष्कार जैसे कदम से:
- न्याय में देरी:
लोगों को अपने मामलों का फैसला मिलने में और ज्यादा समय लगता
है।
- आर्थिक नुकसान:
बार-बार अदालत जाना और सुनवाइ रूकने का इंतज़ार करना लोगों के
लिए महंगा पड़ता है।
- न्याय प्रणाली पर सवाल:
जब लोग देखते हैं कि वकील छोटे-मोटे कारणों से काम रोक देते
हैं, तो उनका विश्वास टूटता है।
न्याय
केवल वकीलों या जजों का काम नहीं है। यह समाज का आधार है। इसे मजबूत करने की
जिम्मेदारी हर किसी की है।
निष्कर्ष
मद्रास
उच्च न्या यालय का यह फैसला एक साफ संदेश देता है कि वकीलों को अपनी जिम्मेदारी
समझनी होगी। छोटे-मोटे कारणों से अदालत का बहिष्कार न केवल गैरकानूनी है,
बल्कि यह समाज और न्याय प्रणाली के खिलाफ भी है। वकीलों को बार
काउंसिल जैसे उचित मंचों का इस्तेमाल करना चाहिए और अपनी समस्याओं का समाधान
ढूंढना चाहिए।
यह
मामला हमें यह भी सिखाता है कि न्याय प्रणाली को मजबूत करने के लिए सभी पक्षों को
मिलकर काम करना होगा। वकील, जज, और
जनता, सभी की इसमें हिस्सेदारी है। आइए, हम सब मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाएं, जहां न्याय समय
पर और निष्पक्ष रूप से मिले।
केस की जानकारी
- केस नंबर:
डब्लू.पी.(एमडी) संख्या 11282/2025
- याचिकाकर्ता:
आर. जिम
- प्रतिवादी:
सचिव, बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु और
पुडुचेरी